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जब बोले पिता... आतंकियों से आबरू बचाने को बहन का गला काट खुद जान दे देना


यह घटना जनवरी 1990 की है। श्रीनगर में आतंकियों ने पड़ोस के दो परिवारों के चार सदस्यों को बंदूक के बल पर घर से निकाला। कॉलोनी के सभी लोगों को इक्कठ्ठा किया। आतंकियों ने हमारी आंखों के सामने ही चारों को गोली मार दी। अपने पड़ोसियों की खून से लथपथ लाशें देखकर हम सभी सिहर गए। अपनी जिंदगी भी खत्म होती नजर आने लगी। आंखों के आगे मौत नाच रही थी। मंजर देख दो जवान बेटियों का पिता बेबस हो गया। पापा ने दादा की दी हुई तलवार मुझे दी और कहा कि अब अगला निशाना हमारा घर है। अगर वह हमला करेंगे तो जान देकर अपनी आबरू बचाना। तलवार से पहले छोटी बहन ज्योति का गला काटना और फिर सिर के बल तीसरी मंजिल से कूद जाना।
यह दास्तान सुनाने के साथ ही कश्मीर की रहने वाली सुरेखा रैना की आंखों से आंसू गिरने लगे। कौवाबाग रेलवे कॉलोनी में रहने वाली सुरेखा के पति संजय रैना पूर्वोत्तर रेलवे में एकाउंट ऑफिसर हैं।
सुरेखा का बचपन कश्मीर की खूबसूरत वादियों में ही गुजरा। जवानी की तरफ कदम रखने के साथ कश्मीर की गलियां हिन्दुओं के खून से लाल होने लगीं। सुरेखा ने बताया कि मेरा पुश्तैनी मकान श्रीनगर के हब्बाकदल चौराहे पर था। दादा नीलकंठ कश्मीर के राजा हरि सिंह की सेना में दरोगा थे। श्रीनगर में हमारा रसूख था। पिता नरेन्द्र नाथ कौल श्रीनगर में राजस्व विभाग में तैनात थे।
वह बताती हैं कि साल 1989 से ही कश्मीर में हालत बिगड़ने लगे। हिन्दुओं को निशाना बनाया जाने लगा। दिसंबर-89 में हालात और बिगड़ गए। रोजाना श्रीनगर की गलियों में लाउडस्पीकर से ऐलान किया जाता कि हिन्दुओं घर छोड़ दो। आतंकी, कश्मीरी पंडितों की लड़कियों को उठा ले जाते, रेप करते फिर सरेआम उनकी हत्या कर देते। पड़ोस में रहने वाले कश्मीरी पंडितों की हत्या के बाद तो पिता का साहस जवाब देने लगा। पड़ोस के मुस्लिम परिवार उनसे कन्नी काटने लगे।
रात दो बजे घर-बार छोड़ कर भागे
बकौल सुरेखा 25 जनवरी 1990 की रात में पड़ोस में रहने वाले मुस्लिम परिवार ने खबर दी कि आज रात को घर पर आतंकी हमला करेंगे। यह सुनकर मां कृष्णा और पिता के हाथ-पांव फूल गए। पिता ने दादा की तलवार मुझे दी और कहा कि हमला हुआ तो जान देकर भी आबरू बचाना। हम दोनों बहनों को तीसरी मंजिल पर छिपा दिया। रात में दो बजे रिश्तेदार आए। उनके साथ हम घर-बार छोड़ कर रातोंरात जम्मू भाग गए। पिता ने घर की चाबी पड़ोस में रहने वाले मुस्लिम परिवार को दी। कुछ दिनों बाद पता चला कि वही पड़ोसी घर पर काबिज हो गया।
पुलवामा के रहने वाले हैं संजय रैना
सुरेखा के पति संजय रैना पूर्वोत्तर रेलवे में एकाउंट आफिसर हैं। संजय भी श्रीनगर से 40 किलोमीटर दूर पुलवामा के रहने वाले हैं। संजय ने बताया कि तनाव बढ़ने के बाद 1989 में परिवार के सदस्य जम्मू आ गए। उसके बाद से आज तक वापस नहीं लौटे। वर्ष 1991 में पूर्वोत्तर रेलवे में नौकरी लगी। 1993 में शादी हुई।
30 साल पहले हटाना चाहिए था धारा 370
दोनों ने ही केन्द्र सरकार के फैसले की सराहना की। सुरेखा का मानना है कि यह काला कानून था। इसे 30 साल पहले हटा दिया जाना चाहिए था। तब शायद हालात इतने खराब नहीं होते। उस समय सरकार ने भी हमारी मदद नहीं की।

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