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लंकापति रावण था पहला कांवड़िया, जानिए कांवड़ यात्रा के 4 प्रमुख नियम

आपको बता दें कि सावन का पवित्र और पावन महीना चल रहा है, इस पावन महीने रोजाना भक्तों की शिवालयों में लम्बी कतार देखने को मिलती है, बता दें कि इसके साथ कावड़ यात्रा भी शुरू हो गयी है, आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सदियों से चली आ रही इस परंपरा की शुरुआत रावण ने की थी।

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धार्मिक किताबों और ग्रन्थ के जानकारों की माने तो इस यात्रा की शुरुआत समुद्र मंथन से हुई थी, मंथन से निकले विष को पीने की वजह से भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया था, विष का बुरा असर भगवान शिव पर ऐसा हुआ कि भक्त रावण को चिंता हुई और उन्होंने उस प्रभाव को कम करने के लिए तप किया, रावण ने दशानन कावड़ में जल भरकर लाया और शिव का जलाभिषेक किया, यहीं से कावड़ यात्रा की शुरुआत हुई।

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कावड़ यात्रा के चार नियम
1-आपको बता दें कि कावड़ यात्रियों के लिए नशा वर्जित बताया गया हैं, इस दौरान तामसी भोजन यानि मांस, मदिरा आदि का सेवन भी नहीं करना चाहिए।
2-बता दें कि बिना स्नान किये कावड़ यात्री कावड़ को नहीं छूते इसके साथ ही तेल, साबुन, कंघी व् अन्य श्रृंगार सामग्री का उपयोग भी कावड़ यात्रा के दौरान नहीं किया जाता।

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3-बता दें कि कावड़ यात्रियों के लिए चारपाई पर बैठना मना है, चमड़े से बनी वस्तु का स्पर्श एवं रास्ते में किसी वृक्ष या पौधे के नीचे कावड़ रखने की भी मनाही है।
4-कावड़ यात्रा में बोल बम एवं जय शिव-शंकर घोष का उच्चारण करना तथा कावड़ को सिर के ऊपर से लेने तथा जहाँ कावड़ रखी हो उसके आगे बगैर कावड़ के ना जाने के नियम पालनीय होता है।

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